अटलजी का अटलराज लिखती युवा पत्रकार मृत्युंजय की कलम…

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चूँकि हर पार्टी की अपनी-अपनी नीति होती है। बीजेपी की भी है, लेकिन दांव खेलने के लिए नीति के अलावे चेहरा भी बहुत मायने रखता है। क्योंकि चेहरा देखकर हीं ये अनुमान लगाया जाता है कि अगले 5 साल तक देशहित में पार्टी का कार्यकलाप कैसा रहेगा। लगभग 37 साल पुरानी बीजेपी पूर्णरूपेण अब तक दो बार सत्ता में आई है। दोनो बार उसने अलग-अलग चेहरे पर दांव लगाए। पहला चेहरा अटल बिहारी वाजपयी का रहा और दूसरा नरेन्द्र दामोदर दास मोदी का है। अटल वाणी ने साल 1998 में बीजेपी को जीत दिलाई तो मोदी मंत्र ने 2014 में। उम्र के लिहाज से असक्षम हो चुके अटलजी अब राजनीति से दूर एकांत का वरण कर रहे हैं, लेकिन मोदी अभी जवान हैं और सक्रीय भी लिहाजा फिलहाल बागडोर उन्ही के हाँथ में है, उम्मीद है आगे तब तक रहेगी जब तक वो सक्षम हैं। लेकिन सता में होना और बात है दिलों में होना और। भले हीं अटलजी अब सियासत से दूर हैं पर लोगों के दिल से नहीं। लोगों के दिलों पर आज भी अटलजी का अटलराज है। पढ़िए, युवा पत्रकार मृत्युंजय की कलम से…

अटल बिहारी दोनों में कुछ समानताएं हो सकती हैं लेकिन कोई तुलना नहीं है। चुनावी जीत से कोई सत्ता पर काबिज हो सकता है लेकिन दिलों पर राज करना और बात है। दोनों की लोकप्रियता अपार है लेकिन अटलजी का सम्मान इस कदर दिल में है कि उनका नाम बिना ‘जी’ के अधूरा और अटपटा लगता है;  मोदीजी को मोदी कहते भी शायद ही किसी को कोई परेशानी होती हो…!

अटल बिहारी वाजपेयी अटल जी अजातशत्रु हैं तो मोदीजी के अपार शत्रु हैं…! मोदीजी तुकबंदी अच्छी कर लेते हैं लेकिन कविताएं अटलजी के नाम हैं। मोदीजी शरीर से अटलजी से अधिक सबल दिखते हैं लेकिन अंतर्मन अटलजी का अधिक अटल है। मोदीजी राष्ट्रवाद भुना सकते हैं लेकिन अटलजी ने उसे हमेशा जिया है…! गलतियां किसी से भी हो सकती हैं लेकिन मोदीजी से आप माफी मांगने की अपेक्षा नहीं कर सकते।

अटल बिहारी वाजपेयी अटलजी इतने नम्र हैं कि खुद बोल देंगे… मैं अविवाहित हूँ, कुंवारा नहीं…। अटलजी नाम से ही नहीं, कर्म से भी अटल हैं…। हो सकता है कि अटलजी के प्रति यह मेरा अटल प्रेम बोल रहा हो लेकिन मेरा मानना है कि अटलजी यदि कोमा वाली स्थिति से निकलकर एक पल के लिए भी खड़े हो जाएं तो उस एक पल में भी तस्वीर यही होगी, जो इस तस्वीर में दिख रही है…!

अटल बिहारी वाजपेयी वे 93 साल हो गए और इनमें कई साल तो सिर्फ जन्मदिन पर याद किए गए हैं अटलजी। कुछ बार पत्रकारों ने उन्हें मार भी डाला लेकिन हर बार वे मौत को चकमा देकर कैलेंडर के पन्ने पलट देने पर विवश कर देते हैं। ईश्वर से कामना है कि मेरे जीवित एकमात्र प्रिय नेता शतायु हों लेकिन इससे भी अधिक कामना है कि वह स्वस्थ हों जाएं! यह स्वप्न ही लगता है लेकिन यह स्वप्न बार-बार आता है…कि… अटलजी बस एक बार खड़े हो जाएं, राष्ट्र से कुछ कह जाएं, राष्ट्र के नाम आखिरी संबोधन ही सही, आखिरी बार ही सही…!

लेखक मृत्युंजय त्रिपाठी देश के जाने-माने युवा पत्रकार हैं। कई बड़े समाचार पत्रों में अपनी सेवा दे चुके मृत्युंजय फिलहाल अमर उजाला में कार्यरत है
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