DGP साहब रोकिये अपनी पुलिस को, वो लूटती है हमें सुरक्षा के नाम पर

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हर वक्त सफर में जीते हैं ।                                                                                                                                              हर वक्त सफर में मरते हैं ।।                                                                                                                                            इस  भुखी पेट की खातिर हीं  ।                                                                                                                                       हर जुल्मों-सितम ये सहते हैं ।।

ये किस्सा है हमारी जमात के उस तबके का जो देश-दुनिया के कोने-कोने से हमारे जरूरत के सामान को सही सलामत हम तक पहुंचाते हैं। इन सब के बीच उनका खुद का जीवन इस कदर उलझा रहता है कि कभीकभार हीं वे खुद के ठिकाने तक पहुँच पाते हैं। एक और घर वालों की यादें उन्हें अन्दर हीं अन्दर सालती हैं, तो दूसरी और घर वालों की जरूरतेँ उन्हें मजबूर करती हैं घर से दूर रहने को। आज उनके बारे में जानने कि कोशिश करते हैं, जिनका सम्बन्ध कहीं ना कहीं हम सब से होता तो है, लेकिन हम जानना नहीं चाहते।

पटना: रात के तक़रीबन 11 बज रहे होंगे। अपनी धुन में मग्न मैं अपनी दो पहिया वाहन से आरा से पटना की तरफ बढ़ रहा था। कुछ वाहनों को छोड़ दें तो दिन की तुलना में सड़क पर यातायात काफी कम थी। हाँ ट्रकों की आवाजाही ठीकठाक थी, वो शायद इसलिए कि दिन के वक्त कई शहरों और बाजारों में इन ट्रकों की नोएंट्री होती है, जो रात में नहीं रहती। लगभग आधी दूरी यानी 30 किलोमीटर चलने के बाद मैं अब बिहटा पहुँच चुका था। अभी आधा सफर बाकी था तो सोचा चाय पी लूँ फिर आराम से आगे बढूंगा। मैं चाय पीने के वास्ते वहीँ एक लाइन होटल पर रुक गया।

होटल पर भीड़ थी, तो चाय का फ़रमाइश कर मैं बाहर लगी कुर्सी पर बैठ गया। ठीक मेरे बगल की कुर्सी पर एक सरदार जी पहले से हीं बैठे थे और उनकी बाजु में एक दूसरा नवजवान। दोनों आपस में कुछ बातें कर रहें थे और किसी को गाली दे रहे थे। कुछ देर तक तो मैं चुपचाप सुनता रहा। बर्दास्त नहीं हुआ तो पूछ लिया “क्या बात है सरदार जी, किस पर गुस्सा निकाल रहे हैं”। इतना सुनना था कि उनका पारा जैसे सातवें आसमान पर चढ़ गया। गाली कि आवाज जो पहले धीमी थी वो तेज हो गयी। सभी लोगों की निगाह अब इधर हीं आ टिकीं। एक पल को तो मैं सन्न रह गया। मुझे लगा कुछ गलती हो गई। वक्त की नज़ाकत को देखते हुए बिना वक्त गँवाए मैंने सरदारजी से माफ़ी मांग ली, और कहा “माफ़ करना सरदार जी अगर मुझसे कुछ गलती हो गई हो”। इतना सुनना था कि सरदारजी के स्वर धीमे पड़ गए और उन्होंने कहा ना पुतर तुझसे कोई गलती नहीं हुई। मैं तो उन पुलिस वालों से परेशान हूँ जो हमारी-तुम्हारी सुरक्षा के नाम पर सरकार से मोटी पगार लेते हैं और सुरक्षा के बजाय सरेराह हम जैसों को लूटते-मारते हैं।

सरदारजी की ये बात सुनने के बाद मुझे देर नहीं लगी पूरा माजरा समझने में, क्योंकि मैंने अक्शर देखा है और टोका है पुलिस वालों को सड़कों पर वर्दी का धौंस दिखा कर नाजायज करते हुए। ख़ास कर ट्रक वालों से। अब समय की परवाह किये बगैर मैं तफसील से सरदारजी की बातें सुनने लगा। दरअसल लुधियाना से अपनी ट्रक में माल लेकर चले सरदारजी को बिहार तक पहुंचने में कई प्रदेशों की सरहदों को पार करना पड़ा है। इस बीच कई नाकों पर पुलिस वालों से उनकी मुलाक़ात हुई, लेकिन सबसे ज्यादा फ़जीहत उन्हें शायद बिहार में झेलनी पड़ी है। सरदारजी कहते हैं कि बिहार में सुरक्षा के नाम पर पुलिस वालों ने जितनी लूट मचा रखी है, उतने तो लूटेरे भी नहीं लूटते। कई बार दूसरे प्रदेशों से माल लेकर बिहार आ चुके सरदारजी के मुताबिक़ यहाँ रात तो रात दिन में भी जगह-जगह पुलिस वाले बेवजह परेशान करते रहते हैं। ये पूछने पर कि पुलिस वालों की तो ये ड्यूटी हीं है जांच-पड़ताल करना, फिर आपको दिक्कत क्या है। तो वो बताते हैं कि ये सही है कि ये उनकी ड्यूटी है, लेकिन वो जो करते हैं वो ड्यूटी नहीं सरासर लूट है। बकौल सरदारजी ड्यूटी की आड़ में सुरक्षा के नाम पर पुलिस वालों ने पूरा सिस्टम हीं खराब कर रखा है। लाव-लश्कर के साथ सड़क  पर मुस्तैद पुलिस वाले  पहले कागज़ माँगते हैं, कागज़ दिखाओ तो फिर पैसे मांगते हैं। पैसे दो तो बिना कागज़ के भी गाड़ी पास करा देंगे ना दो तो गाली गलौज करने लगते हैं। इतना हीं नहीं कभी-कभी तो वो बेवजह पिटाई भी कर देते हैं।

सरदारजी अभी अपनी बात ख़त्म भी नहीं कर पाए थे कि एक दूसरे सख्श ने अपनी व्यथा सुनानी शुरू कर दी। उसके मुताबिक़ पुलिस वाले सड़कों पर रोक कर उनसे पैसे वसूलते हैं। ना दो तो गाड़ी में शराब कि बोतल रख कर झूठे मुकदमें में फ़साने कि धमकी भी देते हैं। इस तरह से कई और लोगों ने भी अपनी आपबीती सुनाई जिसमें पुलिस वालों की भूमिका पर कई सवाल उठे। ड्राइवरों की माने तो सवाल भूखे पेट का ना होता तो वो बिहार आना तो दूर देखना तक मुनासिब नहीं समझते।

बहरहाल आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह है, ये सही भी हो सकते हैं और गलत भी, लेकिन पुलिस पर लग रहे ऐसे आरोपों को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि इसमें अगर थोड़ी भी सच्चाई है तो बिहार की साख, छवि और सुरक्षा तीनो कमजोर हो रही है। आज जो पुलिस जायज लोगों से नाजायज पैसे वसूल कर रही है कल नाजायज लोगों से पैसे लेकर नाजायज काम को भी नजरअंदाज कर सकती है।

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