नशामुक्ति और स्वच्छता से दूर रखें हेपेटाइटिस

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हेपेटाइटिस दो प्रकार के होते हैं एक्यूट और कॉनिक. एक्यूट हेपेटाइटिस के लक्षण जल्दी नहीं पता चलते. यह दूषित भाेजन-पानी और मल करने के बाद सही से हाथ व पैरों की सफाई नहीं करने के कारण होते हैं. इससे मुख्य रूप से पाचन संबंधी समस्या देखने को मिलती है. हेपेटाइटिस ए और इ इसी ग्रुप में आता है. खान-पान में सुधार लाकर और साफ-सफाई बरत कर इसे बिना दवाई दिये भी ठीक किया जा सकता है. कभी-कभी लक्षण के हिसाब से दवाई भी देनी पड़ती है. दूसरा प्रकार होता है क्रॉनिक का. यदि हेपेटाइटिस के वायरस छह माह से अधिक रोगी को परेशान करें, तो यह क्रॉनिक केस माना जाता है. हेपेटाइटिस बी, सी और डी इसी के अंतर्गत आते हैं. हेपेटाइटिस बी एचबीवी के कारण होता है. इसके लक्षण देर से पता चलते हैं. यह जॉन्डिस का प्रमुख कारण है. इसके प्रमुख लक्षणों में त्वचा और आंखों का पीलापन, गहरे रंग का मूत्र, अत्यधिक थकान, उल्टी और पेट दर्द हैं.
लिवर का सूजन है हेपेटाइटिस
यदि लिवर में सूजन रहता हो, तो संभव है कि आपको हेपेटाइटिस हो. यह इन्फेक्शन से होनेवाली अत्यधिक खतरनाक बीमारी है. यह वायरस और कभी-कभी बैक्टीरिया के कारण भी होता है. ग्रामीण इलाकोें में खुले में शौच करना इसका मुख्य कारण है. तालाब या कुएं का पानी यदि संक्रमित हो जाये, तो यह पूरे गांव को बीमार कर सकता है. इसे एपिडेमिक फॉर्म कहते हैं. शहरों में पेयजल को पाइपों के माध्यम से घरों तक पहुंचाया जाता है. यदि पाइपों में रिसाव हो, तो नाले का गंदा पानी इसे भी दूषित कर देता है. इससे भी संक्रमण तेजी से फैलता है. इसके अलावा असुरक्षित यौन संबंध से, संक्रमित खून लेने से, टैटू बनवाने के दौरान इन्फेक्शन होने से और ड्रग्स के इन्जेक्शन लेने से होता है. शराब के अत्यधिक सेवन से लिवर के डैमेज होने, मां से उसके बच्चे को, ड्रग्स की लत जिसमें एक ही सूई से कई लोगों को इन्जेक्शन या ड्रग्स का लेना, हॉस्पिटल में काम करनेवाले कर्मियों को और ब्लड ट्रांसप्लांट के दौरान इन्फेक्शन के फैलने से हेपेटाइटिस सी का खतरा होता है. हेपेटाइटिस सी का कोई इलाज नहीं है. वहीं, हेपेटाइटिस डी की बात की जाये, तो यह परजीवी वायरस है और हेपेटाइटिस बी के साथ ही जीवित रह सकता है. जब ये दोनों वायरस फैलते हैं, तो व्यक्ति को बचा पाना मुश्किल हो जाता है.

वैक्सीनेशन है बेस्ट उपाय
हेपेटाइटिस ए और बी से बचने के लिए टीका या वैक्सीनेशन बेस्ट उपाय है, पर ‘सी’ से बचने के लिए अभी तक वैक्सीनेशन नहीं आया है. इसलिए इससे बचने का एक ही उपाय है और वह है सावधानी. ड्रग्स इन्जेक्शन, इन्फेक्टेड ब्लड और असुरक्षित यौन संबंधों से बचाव कर हेपेटाइटिस सी के खतरे को दूर रखा जा सकता है. यदि क्रॉनिक हेपेटाइटिस हो जाये, तो इसकी जांच एचबीएसएजी टेस्ट, लिवर फंक्शन टेस्ट, एचबीवी का डीएनए टेस्ट आदि से पता लगाया जा सकता है, पर ये जांच काफी महंगे होते हैं. इलाज के लिए एंटी वायरल मेडिकेशन किया जाता है. वहीं, इस का वैक्सीनेशन 0,1,6 या 0,1,12 की तर्ज पर किया जाता है, जिसका मतलब होता है, पहले महीने, फिर एक माह बाद और फिर छह या 12 माह बाद वैक्सीनेशन कराना. वैक्सीनेशन का खर्च 200 रुपये के करीब आता है, पर क्रॉनिक स्टेज में एक टेस्ट का खर्च तीन से चार हजार रुपये आता है और यह हर तीन माह पर कराना पड़ता है. क्रॉनिक स्टेज में डीएनए लेवल का वैल्यू ज्यादा हो, तो लिवर सिराेसिस और लिवर कैंसर तक हो सकता है. जो व्यक्ति के मौत का कारण बनता है.

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