राफेल डील क्या है? जानिए इस सौदे से जुड़ी हर बात…

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वर्तमान में राफेल सौदे को लेकर भारतीय राजनीति में भूचाल आया हुआ है। राफेल लड़ाकू विमान खरीद पर छिड़ी सियासी जंग में आये दिन नए नए खुलासे हो रहे हैं। राफेल विमान सौदे को लेकर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमलावर है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस डील में फ्रांस की दसॉल्ट एविएशन से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के सौदे में नरेंद्र मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। राफेल डील को बोफोर्स से भी बड़ा घोटाला बताया जा रहा है। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को निराधार बताया है।

आइए जानते हैं राफेल क्या है? कैसे हुआ यह पूरा सौदा और क्या है इसमें विवाद…

राफेल (RAFALE) क्या है?

राफेल अनेक भूमिकाएं निभाने वाला एवं दोहरे इंजन से लैस फ्रांसीसी लड़ाकू विमान है और इसका निर्माण डसॉल्ट एविएशन ने किया है। राफेल विमानों को वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक सक्षम लड़ाकू विमान माना जाता है।

संप्रग (UPA) सरकार का क्या सौदा था ?

भारत ने 2007 में 126 मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) को खरीदने की प्रक्रिया शुरू की थी, जब तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने भारतीय वायु सेना से प्रस्ताव को हरी झंडी दी थी। इस बड़े सौदे के दावेदारों में लॉकहीड मार्टिन के एफ-16, यूरोफाइटर टाइफून, रूस के मिग-35, स्वीडन के ग्रिपेन, बोइंड का एफ/ए-18 एस और डसॉल्ट एविएशन का राफेल शामिल था। लंबी प्रक्रिया के बाद दिसंबर 2012 में बोली लगाई गई। डसॉल्ट एविएशन सबसे कम बोली लगाने वाला निकला। मूल प्रस्ताव में 18 विमान फ्रांस में बनाए जाने थे जबकि 108 हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ मिलकर तैयार किये जाने थे। संप्रग सरकार और डसॉल्ट के बीच कीमतों और प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण पर लंबी बातचीत हुई थी। अंतिम वार्ता 2014 की शुरुआत तक जारी रही लेकिन सौदा नहीं हो सका। प्रति राफेल विमान की कीमत का विवरण आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किया गया था, लेकिन तत्कालीन संप्रग सरकार ने संकेत दिया था कि सौदा 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर का होगा। कांग्रेस ने प्रत्येक विमान की दर एवियोनिक्स और हथियारों को शामिल करते हुए 526 करोड़ रुपये (यूरो विनिमय दर के मुकाबले) बताई थी।

मोदी सरकार (NDA) द्वारा किया गया सौदा क्या है?

फ्रांस की अपनी यात्रा के दौरान, 10 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि सरकारों के स्तर पर समझौते के तहत भारत सरकार 36 राफेल विमान खरीदेगी। घोषणा के बाद, विपक्ष ने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री ने सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की मंजूरी के बिना कैसे इस सौदे को अंतिम रूप दिया। मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलोंद के बीच वार्ता के बाद 10 अप्रैल, 2015 को जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया कि वे 36 राफेल जेटों की आपूर्ति के लिए एक अंतर सरकारी समझौता करने पर सहमत हुए।

2012 में राफेल को ‘एल1बिडर’ घोषित किया गया

डिफेंस वेबसाइट जेन्स के अनुसार साल 2015 में भारत के साथ कतर ने भी फ्रांस से राफेल विमान खरीदने के लिए समझौता किया था. 24 राफेल विमानों के लिए कतर ने समझौता 7.02 बिलियन डॉलर में किया गया. स्ट्रेटजी पेज की एक रिपोर्ट के अनुसार कतर को एक राफेल लगभग 108 मिलियन डॉलर यानी करीब 693 करोड़ रुपये का मिला. वहीं भारत को इन विमानों के लिए कहीं ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है.

सितंबर 2016 में हुई थी डील

भारत और फ्रांस ने 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए 23 सितंबर, 2016 को 7.87 अरब यूरो (लगभग 5 9, 000 करोड़ रुपये) के सौदे पर हस्ताक्षर किए। विमान की आपूर्ति सितंबर 2019 से शुरू होगी।

एचएएल (HAL) का मामला

सौदे के आलोचकों का कहना है कि यूपीए के सौदे में विमानों के भारत में एसेंबलिंग में सार्वजनिक कंपनी हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड को शामिल करने की बात थी। भारत में यही एक कंपनी है जो सैन्य विमान बनाती है। लेकिन एनडीए के सौदे में एचएएल को बाहर कर इस काम को एक निजी कंपनी को सौंपने की बात कही गई है। किसी भरोसेमंद सरकारी कंपनी की जगह अनाड़ी नई निजी कंपनी को शामिल करना कैसे उचित हो सकता है। यानी विरोधि‍यों के मुताबिक एनडीए सरकार एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि सौदे से HAL को 25000 करोड़ रुपये का घाटा होगा।

कांग्रेस ने लगाया भ्रष्टाचार का आरोप 

कांग्रेस इस सौदे में भारी अनियमितताओं का आरोप लगा रही है। उसका कहना है कि सरकार प्रत्येक विमान 1,670 करोड़ रुपये में खरीद रही है जबकि संप्रग सरकार ने प्रति विमान 526 करोड़ रुपये कीमत तय की थी। पार्टी ने सरकार से जवाब मांगा है कि क्यों सरकारी एयरोस्पेस कंपनी एचएएल को इस सौदे में शामिल नहीं किया गया। कांग्रेस ने विमान की कीमत और कैसे प्रति विमान की कीमत 526 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1,670 करोड़ रुपये की गई यह भी बताने की मांग की है। सरकार ने भारत और फ्रांस के बीच 2008 समझौते के एक प्रावधान का हवाला देते हुए विवरण साझा करने से इंकार कर दिया है।

सरकार की प्रतिक्रिया?

लगभग दो साल पहले, रक्षा राज्य मंत्री ने संसद में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था कि प्रत्येक राफेल विमान की लागत लगभग 670 करोड़ रुपये है, लेकिन संबंधित उपकरणों, हथियार और सेवाओं की कीमतों का विवरण नहीं दिया। बाद में, सरकार ने कीमतों के बारे में बात करने से इनकार कर दिया। साथ ही यह कहा जा रहा है कि 36 राफेल विमानों की कीमत की “डिलिवरेबल्स” के रूप में 126 लड़ाकू विमान खरीदने के मूल प्रस्ताव के साथ “सीधे तुलना” नहीं की जा सकती है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आज एक फेसबुक पोस्ट लिखकर कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी पर सौदे के बारे में झूठ बोलने और दुष्प्रचार करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राजग सरकार द्वारा हस्ताक्षरित सौदा संप्रग सरकार के तहत 2007 में जिस सौदे के लिये सहमति बनी थी उससे बेहतर है।

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ने मोदी सरकार पर रिलायंस की सिफारिश करने का आरोप लगाया

फ्रांस की एक पत्रिका में छपे साक्षात्कार में ओलांद ने कहा कि भारत सरकार की तरफ से ही रिलायंस डिफेंस का नाम दिया गया था। इसमें दसाल्ट एविएशन की कोई भूमिका नहीं है। ओलांद के अनुसार, भारत सरकार ने जिस कंपनी का नाम दिया उससे दासल्ट ने बातचीत की। दसाल्ट ने अनिल अंबानी से संपर्क किया। हमें जो वार्ताकार दिया गया, हमने स्वीकार किया। ओलांद की यह बात सरकार के दावे को खारिज करती है जिसमें कहा गया था कि दसाल्ट और रिलायंस के बीच समझौता एक कमर्शियल डील था जो कि दो प्राइवेट फर्म के बीच हुआ। इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।

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