मजदूर दिवस पर पढ़िए सेवानिवृत IPS प्रशान्त करण का यह लेख ‘मैं मजदूर नहीं हूँ’

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रांची: आज एक मई है। मजदूर दिवस है। अपने देश के अलावा यह अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस है। आज सुबह से मेरे पास मजदूर दिवस की शुभकामनाओं का तांता लगा है। कई विधाओं में इस विषय पर रचनाएँ भी आ रहीं हैं। ये सब मुझे चिढ़ा रहे हैं। आज एतत द्वारा मैं ऐलानिया तौर पर सार्वजनिक रूप से सामाजिक मीडिया के माध्यम से बकायदा घोषित करता हूँ कि मैं मजदूर नहीं हूँ। मजदूर मजबूर होता है। मैं भी मजबूर हूँ। लेकिन मैं कतई अपने आप को मजदूर कहने का घनघोर विरोध करता हूँ। मैं मजदूर नहीं हूँ और न मजदूर कहा जाना भी पसन्द  करता हूँ।

मैं पहले जीता-जागता,सोचने वाला एक इंसान था। खाता-पीता, खुश रहने वाला इंसान। संवेदित भी होता था। जो जी करता करने की इच्छा होती कर बैठता था। खूब मन की किया करता। मनमानी भी कम नहीं थी। हँसमुख भी था। जी खोलकर हँसता। ठहाके भी लगता। अपने मन की बात भी करता। सबसे बेझिझक। खुल्लमखुल्ला। सबके घर जाता। सबसे बातें करता। पढ़ाई में गलती से मन भी लगाता ,नतीजतन स्कूल और कॉलेज में परिणाम अच्छे हो जाते। इसमें मेरा कोई दोष नहीं हुआ करता। उन दिनों बड़े बाल रखने का फैशन हुआ करता था, जिससे मैं भी अछूता नहीं था।

समय-समय पर आवश्यकता के अनुसार ज़ुल्फ़ों को सजाने-संवारने के लिए कंघी भी जीन्स पैंट की पिछली जेब में रखा करता। घर से बाहर आते-जाते शर्ट के ऊपर के एक बटन, फिर बाद में दो बटन भी खुले रहने लगे थे। रोज दाढ़ी बनाता था। स्प्रे करना न भूलता। नौकरी लगते ही बड़ी रकम जेब मे आने लगी थी। जिससे मेरी और दोस्तों की मौज हुआ करती। अकेले नाईट शो भी देख लेता,अच्छे रेस्टोरेंट में खाना भी खाता। मनपसंद खाना भी घर मे मिलता। जब मर्जी सोता,जब मर्जी उठता। छुट्टी के पल घर में रहने पर टीवी में क्रिकेट मैच भी देखता, दोस्तों के साथ भी देखता। पानवाले,सिगरेट वाले के यहाँ खाता भी चलता। किसी से नहीं डरता।

फिर मेरे साथ कुछ ऐसी दुर्घटना घटी कि मेरी ज़िंदगी रातों-रात बदल गयी। मैं अपने आप पूर्व के आचरण के ठीक विपरीत होता चला गया और मुझे पता भी नहीं चला। मेरी मनमानी पर एकदम से हैड्रोलिक ब्रेक जैसा लग गया। दिनचर्या हीं बदल गयी। हँसना छोड़िए,मुस्कुराना भी भूल गया। ठहाके लगाना तो दूर एकदम चुप रहने की प्रैक्टिस करने लगा। मन की बात मन में ही रखकर उन्हें दबाने की कला में माहिर होना सीखने लगा। शामें घर में बीतने लगीं। ऑफिस से सीधा घर आता। देर होने से काफी सच्चाई के साथ कैफियत देने की आदत पड़ने लगी। पगार मिलते ही छीन जाती। बड़ी मिन्नतों के बाद आधा-अधूरा जेब खर्च मिलता।

बाल आर्मी कट हो गए, छोटे, घुटे हुए। चेहरा लटक गया। उसमें जबरन गम्भीरता लायी गयी। दोस्ती छूट गयी। सुबह बालों में तेल चुपड़ने की आदत पड़ गयी। कंघी से पीछा छूट गया। शर्ट के बटन बन्द हो गए। बाइक की जगह पुराने स्कूटर ने ले ली। अब बमुश्किल बीस पच्चीस की स्पीड में सड़क के एकदम किनारे ड्राइव करने लगा। आंखों पर मोटे शीशे के चश्मे चढ़ गए। अकेले सिनेमा तो क्या मार्किट तक जाने पर पाबंदी लग गयी। अकेले सिर्फ राशन,दूध,पेपर,सब्जी वगैरह लेने जाता। पान-सिगरेट की दुकान तक भूल गया। किसी पर कोई खर्च करने की औकात खत्म हो गयी।

नए कपड़े पर्व-त्योहारों पर कभी-कभार मिलते , वे भी मेरी पसन्द के नहीं होते। घर में तड़के सुबह जग जाता। चाय खुद बनाता। औरों को भी देता। घर के सारे काम यथा झाड़ू लगाना,पोछा करना,बर्तन धोना, खाना बनाना,अपनी टिफिन पैक करना,शाम में ऑफिस से घर आकर चाय बनाना, रात का खाना दूसरे की मर्जी से बनाना,रात में बर्तन धो लेना मेरी दिनचर्या हो गयी। ऑफिस से सीधे घर पंहुचता। थक कर सोने से पहले बिना पैर दबाए सोने की चेस्टा करता तो झिड़कियाँ कर्तव्यबोध लेकर जगा जातीं। डांट अब कॉप्लिमेंट लगने लगा और उसकी आदत पड़ गयी। शर्ट के बटन टूटने पर कैफियत देकर खुट टंकता। कपड़ों पर स्त्री भी खुद करता।

अब आप कहेंगे कि यह तो सौ फीसदी मजदूरों के लक्षण हैं। तुम झूठ बोलते हो। तुम एकदम मजदूर ही हो, निःसन्देह। लेकिन जनाब मैं अपनी बात पर कायम हूँ। मैं मजदूर नहीं हूँ। ऑफिस से लेकर घर तक पहले पति हूँ, फिर अफसर। एक बार अखिल भारतीय पीड़ित पति संघ के माननीय पदधारियों को मेरी स्थिति का पता चला। एक विशेष बैठक आहूत की गई। बैठक की सुबह से ही सारे पदधारी अस्पताल में भर्ती हैं।

 अब तो आप मुझसे सहमत हैं न! मैं मजदूर नहीं हूँ। मात्र एक साधारण भारतीय पति हीं हूँ।

मैं मजदूर नहीं हूँ, मजदूर दिवस, IPS प्रशान्त करण
लेखक प्रशान्त करण सेवानिवृत IPS अधिकारी हैं।
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