Opinion : कन्हैया के राजनीति में आने की आहट को चुनौती तो नहीं मान बैठे राजनीतिक दल!

2016 के JNU प्रकरण में जब कन्हैया का नाम सामने आया तब मीडिया की सुर्खियों ने उन्हें देशभर में चर्चा केंद्र बना दिया और इस दौरान भारत के तमाम राजनीतिक पार्टियों ने कन्हैया पर बयानबाज़ी कर उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर ला खड़ा किया। इसी लोकप्रियता ने एक छात्र नेता को देश में राजनीति की ज़मीन बेहद आसानी से उपलब्ध करा दी।

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2016 के JNU प्रकरण में जब कन्हैया का नाम सामने आया तब मीडिया की सुर्खियों ने उन्हें देशभर में चर्चा केंद्र बना दिया और इस दौरान भारत के तमाम राजनीतिक पार्टियों ने कन्हैया पर बयानबाज़ी कर उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर ला खड़ा किया। इसी लोकप्रियता ने एक छात्र नेता (Ex JNUSU President Kanhaiya Kumar) को देश में राजनीति की ज़मीन बेहद आसानी से उपलब्ध करा दी।

JNU में कथित देशद्रोही नारे लगाने के आरोप में जिस तरह से मीडिया और राजनेता कन्हैया पर बयानबाज़ी कर रहे थे। उसी समय देश के युवाओं के दिल में कन्हैया धीरे -धीरे जगह बनाते जा रहे थे। दक्षिणपंथी विचार धारा रखने वाला युवा भी दोस्तों की महफ़िल में यह कह रहा था चाहे जो भी हो बन्दे (Kanhaiya Kumar) में दम है, बोलता बहुत अच्छा है। 
बात कुछ हद तक सही भी थी कन्हैया जिस तरह से टीवी स्टूडियो में बैठे तेज तर्रार एंकरों के सवालों का जबाब बेबाकी से दे रहे थे वहीँ दूसरी और भाजपा के प्रवक्ताओं की बखिया भी उधेड़ रहे थे। उनके इस ATTITUDE को युवा वर्ग ने हांथो हाँथ लिया (कुछ चुपके से) । टीवी मीडिया और राजनीतिक वक्ताओं के सामने बोल तो कन्हैया रहे थे लेकिन उत्तर से लेकर दक्षिण तक के युवाओं को लग रहा था ये तो उनकी जुबान है। और यहीं से भारत की राजनीति (Indian Politics) में लगभग तय हो गया था कि आने वाले वक़्त में बेहद साधारण से दिखने वाले इस युवा की चुनौती का सामना भारत की राजनीति को लगभग अपनी जागीर समझ बैठे राजनेताओं को करना पड़ेगा।

 
कन्हैया पूरे देश में सभाएं कर नरेंद्र मोदी की सरकार( Narendra Modi gov.)पर लगातार सवाल खड़े कर थे। आम तौर पर ऐसा होता है कि राजनीति में दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है । पर कन्हैया के मामले में ऐसा नहीं था । कन्हैया के हमले एनडीए सरकार पर जारी रहे लेकिन भाजपा के साथ- साथ कन्हैया भारत के सभी विपक्षी पार्टियों के आँख की किरकिरी बन गए। 

जैसे देश में लोकसभा चुनाव (General Election 2019) का बिगुल बजा देेश में कन्हैया को लेकर यह चर्चा भी शुरू हो गयी कि पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अपने गृह छेत्र बेगूसराय से चुनाव के रण में कूदेंगे। जहाँ एक और देश में लगभग हासिये पे खड़ा वामपंथ कन्हैया के जरिये एक बार फिर राजनीतिक ज़मीन पर अपना खोया वजूद वापस पाने के सपने देख रहा था। वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रिय पार्टी कांग्रेस के राहुल गांधी (हालाँकि क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू पार्टी कहना ज़्यादा बेहतर) और बिहार की सबसे बड़ी पार्टी राजद के करिश्माई नेता लालू यादव (Lalu yadav)  के युवा पुत्र तेजस्वी यादव् , कन्हैया को अपना सहयोगी कम राजनीतिक प्रतिद्वंदी ज्यादा मान बैठे। हालाँकि राजनीति से जुड़े लोग यह भी बताते हैं कि जेल में बंद लालू यादव ने अपने बेटे को आगाह कर दिया था कि अगर बिहार की राजनीति में अपना कद ऊँचा रखना है तो कन्हैया की आवाज़ को उठने मत दो। यही वजह है कि जाती की छाती पर सवार होकर राजनीति में आये स्वघोषित मल्लाहों के ठेकेदार (मल्लाह -बिहार की एक जाती का नाम) मुकेश सहनी को महागठबंधन में तीन सीटें दे दी गयी। और कन्हैया के नाम पर विचार तक नहीं किया गया।

Kanhaiya Kumar in Patna with lalu and tejaswi yadav
लालू और तेजस्वी यादव के साथ कन्हैया कुमार

सूक्ष्म राजनीति में माहिर लालू ने उस दिन ही कन्हैया के तेवर को भांप लिया था जब नीतीश ने भाजपा से अलग होकर राजद के साथ चुनाव लड़ा था और क्षणभंगुर गठबंधन की सरकार बनने के बाद कन्हैया बिहार आये थे और लालू से विशेष मुलाकात की थी। आपको याद होगा तब नीतीश ने कन्हैया को VIP ट्रीटमेंट दिया था और उनके सुरक्षा पर भी बड़े नेताओं जैसा ध्यान दिया गया था।

बहरहाल, बिहार में महागठबंधन ने काफी सर फुटौवल के बाद सीटों का बंटवारा तय कर लिया है और इस बटवारें में कन्हैया के लिए दरवाजे बंद दिख रहे है। अब कन्हैया चुनाव लड़ते है या नहीं यह वो ही जाने लेकिन इतना साफ़ है। कन्हैया भले बेबाक हो लेकिन उन्हें सीखना होगा भारत की राजनीतिक पगडंडियों पर कैसे चला जाता है। क्योंकि यहाँ ‘अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियाँ’! बाकी यहाँ लोकतंत्र है और जनता समझदार भी है।

इस लेख को सिद्धार्थ गौतम ने infolism.com के लिए लिखा है।

(डिस्क्लेमर:इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय infolism.com के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं।)

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