ऐसी कुप्रथा, जिसका दंश जीवनभर झेलती हैं महिलाएं

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डॉ बिन्दा सिंह, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से बातचीत
 
प्रथा और धर्म के नाम पर लड़कियों को कई बार ऐसी शारीरिक एवं मानसिक यातना मिलती है। इसकी पीड़ा उन्हें ताउम्र झेलनी पड़ती हैं। जेनिटल म्यूटिलेशन ऐसी ही एक प्रथा है। जो न सिर्फ उन्हें उस समय दर्द देता है, बल्कि यह उनकी जिंदगी को भी बर्बाद कर देती है। शारीरिक विकारों के रूप में उन्हें कई संक्रामक बीमारियों से जूझना पड़ता है, जिसमें एचआइवी और एड्स भी शामिल हैं। इससे वे मानसिक रूप से भी बचपन से ही खुद को डिप्रेशन से घिरा हुआ पाती हैं और चाह कर भी ताउम्र उससे बाहर नहीं निकल पाती हैं।
जेनिटल म्यूटिलेशन आमतौर पर सात से 18 साल के बच्चियों में होनेवाला खतना है, जिसमें उनके जेनिटल पार्ट को पूरी तरह या थोड़ा भाग काट दिया जाता है। धर्म व प्रथा के नाम पर महिलाओं को इतनी पीड़ा दे दी जाती है कि वे पुरुषों की बराबरी करने की सोच भी नहीं पातीं। महिलाओं के इस शोषण पर संयुक्त राष्ट्र ने आवाज उठाई और कहा कि किसी बच्ची के सेक्स ऑर्गन को नुकसान पहुंचाना घिनौना कृत्य और घोर अपराध है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों पर नजर डालें, तो हर रोज छह हजार लड़कियां इस कुप्रथा की शिकार होती हैं, जो महिला के साथ किये गये शारीरिक एवं मानसिक यातना की श्रेणी में आता है।

समझें मां की पीड़ा

एक बच्ची को छोटी-सी सूई चुभ जाये, तो मां की जान निकल जाती है, ऐसे में बच्ची को लहुलुहान कर देने पर दोनों पर क्या बीतती होगी। मां खुद के वजूद को लेकर तो भ्रमित रहती ही है एवं उसके अंदर असुरक्षा, असहाय की स्थिति घर कर जाती है। उसके अचेतन मन में ट्रिगर बिहेवियर आने लगता है। लड़कियां खुदको हमउम्र बच्चों से कमजोर और अलग-थलग मानने लगती हैं। धीरे-धीरे इनमें समाज के प्रति घृणा होने लगती है। चिड़चिड़ापन, अक्रमकता के साथ वे अंतरद्वंद्व में जीने लगती हैं। हमउम्र लड़कों के सामने असहज महसूस करने लगती हैं. बड़े होने पर सेक्स आनंद की कमी, हीन भावना एवं खुद से घृणा उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है। वे पूरी जिंदगी खुद को डिप्रेशन में पाती हैं। व्यवहार संबंधी समस्याओं के साथ उसे अपनी कौम एवं समाज बुरा दिखने लगता है। वह खुद से और दुनिया से भी नफरत करती है।

आवाज उठाइये, निंदा करना है जरूरी

एक अच्छी पहल है कि इस निंदनीय कर्म की संयुक्त राष्ट्र सभा ने निंदा की और इसे पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव उठाया है। 2016 में आकड़ों के मुताबिक सात करोड़ लड़कियां इस कुप्रथा की शिकार बनी थीं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार जिन समुदायों में यह प्रथा है, वहां इसका कारण जानने की कोशिश की गयी, तो लोगों ने यह बात स्वीकारी कि यह पहले से चला आ रहा है, इसलिए वे भी इसे निभा रहे हैं और असल कारण किसी को पता नहीं है। कुछ समुदायों ने स्वीकार किया कि वे अपने समुुदाय से बाहर न निकाले जायें, इसलिए इसे फाॅलो करते आ रहे हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि इस कुप्रथा के नकारात्मक पहलुओं की चर्चा हो और महिलाओं और मासूम बच्चियों को इस जीवनभर के दर्द से छुटकारा दिलाया जाये।
भारत में भी कई ऐसे समुदाय हैं, जो इस कुप्रथा का समर्थन करते हैं और उसे ईश्वर की इच्छा मानते हैं। हालांकि, शती प्रथा की तरह इस प्रथा को खत्म करने के लिए भी विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और संयुक्त राष्ट्र कई तरह की मुहिम चलाता है। इसलिए हर साल छह फरवरी को इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस फॉर फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन जागरूकता कार्यक्रम पूरे विश्व में चलाया जाता है। और हमें भी इसे रोकने के लिए पुरजोर विरोध करना चाहिए, ताकि इसे जड़ से खत्म किया जा सके।
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